Friday, September 24, 2010

Your poem..

It's a little bit funny this feeling inside
I'm not one of those who can easily hide
I don't have much money but boy if I did
I'd buy a big house where we both could live
If I was a sculptor, but then again, no
Or a man who makes potions in a traveling show
I know it's not much but it's the best I can do
My gift is my song and this one's for you
And you can tell everybody this is your song
It may be quite simple but now that it's done
I hope you don't mind
I hope you don't mind that I put down in words
How wonderful life is while you're in the world
I sat on the roof and kicked off the moss
Well a few of the verses well they have got me quite cross
But the sun's been quite kind while I wrote this song
It's for people like you that keep it turned on
So excuse me forgetting but these things I do
You see I've forgotten if they're green or they're blue
Anyway the thing is what I really mean
Yours are the sweetest eyes I've ever seen

Tuesday, September 7, 2010

The Transition

Transition, no man’s land
Territory between the old and the new
Where all doors have slammed shut behind
And none have opened in welcome
Fully dilated and ready for birth
From the former reality
To a new beginning with new goals

Only I cannot see ahead
I am lost in the mists of this world
Relying on my inbuilt radar and God’s Grace
I walk the tightrope between trust and despair
My eyes are blind
To what is waiting to reveal itself to me
Just around the corner.

Friday, September 3, 2010

Tanhaai..

तन्हाई ने एक दिन
मुझसे चुपके से यूं कहा,
दिल तुम्हारा आजकल
ऐसे क्यों धडक रहा ?
अपनी धडकनों से तुम कुछ क्यों नहीं कहते,
हंसी-खुशी वो चुपचाप शान्त क्यों नहीं रहते ?
मैं तो अब भी हुँ तुम्हारे साथ
यूँ ही कसकर थामे रखो मेरा हाथ ।

मैं मंद-मंद मुसकाया
आँखें मुंदकर इशारों में ही ये जताया,
सुनी है,
मैंने भी धडकनों की बात,
खफ़ा हैं वे तुमसे आज रात ।
जशन की रात भी तुम देरी से आते हो
उस पर बहाने पे बहाने बनाए जाते हो ।

पता है,
हमें भी मौसम का मिज़ाज़ खुब,
तुम भी धीरे-धीरे बदल रहे हो अपना रंग-रुप ।
सुना है,
तुम्हारे दोस्तों की ज़मात भी बढती ही जा रही
उस फ़हरिस्त में हमारी यारी नीचे ही फिसलती आ रही ।

याद है,
जब शहर में तुम नए-नए थे
एक छत की तलाश में
दिन-भर फिरते रहते थे
थोडा़ हैरान, कुछ परेशान ।
अपने अच्छे-बुरे कई दोस्तों की बातों को अनसुनी कर
बुलावा दिया था तुम्हें एक शाम अपने घर पर।

उस शाम,
अपनी कहानी कहते-कहते ही सो गए थे तुम
अंधेरे में देख ना पाया
कि रात भर इतने रोए थे तुम ।
बात सुबह समझ में आई
जब पाया, की तकिया तब भी गीला पडा़ था ।
हाथ बढा़कर मैंने कहा था
मेरे कमरे में ही क्यों नहीं रह जाते ।
लिखते-पढते,
सुनते-सुनाते,
नए-पुराने कुछ गीत गुनगुनाते
कट जाएगी ज़िन्दगी यूं ही दिन-रात ।

वैसे भी,
मैं भीड़-भाड़, शोर-शराबे से दूर रहता हुँ
अक्सर पार्टीयों में भी बडा़ बोर होता हुँ
सच्ची-सच्ची कहना
क्या तुम दोगे मेरा साथ ?
तो कसकर थाम लूँ मैं आज ही तुम्हारा हाथ ।

एक वो दिन था
और एक आज का दिन है ,
अब तुम स्वार्थी हो गए हो
कुछ को रुलाते हो
कुछ को सताते हो ।
अपने दोस्तों को समझाते क्यों नहीं
तुमसे दोस्ती सबकी फितरत में नहीं ।

और तुम भी
बंगला-गाडी़ के चक्कर में मत पड़ना
खुशी अगर वहाँ होती
तो तुम्हें फिर क्यों कहते लोग अपना ।
अब बस लौट आओ,
आखिरी कुछ सांसों में तो दोगे तुम मेरा साथ,
तुम्हारे संग
शायद यही हो जशन की आखिरी आज रात ।

Khwahishein..

Hazaaron khwahishein aisi,
ki har khwahish pe dum nikle..
Bahut nikle mere armaan,
lekin phir bhi kam nikle..

Thursday, September 2, 2010

Ajeeb si yeh zindagi..

कुछ ख्वाबों को तकीए पर अकेला छोड आया हुँ,
मुस्कुराते हुए स्वार्थ को बेडीयों में जकड आया हुँ
बंगला गाडी के बुलबुलें यूं ही उडा आया हुँ,
ऐशो आराम की कश्ती भी गंगा में बहा आया हुँ,
आसमानी छत के तले एक फलक ढुंढने आया हुँ ।

बेनाम, बेकश, बेखुदी में गुम हो गया है जो कहीं,
सडकों पर हर पल रेंगती हुई ज़िन्दगी में,
झूठ के साये मे हरी-भरी फूलती-फलती ज़िन्दगी में,
हर सफलता पर अपना नाम थोपने को बेकरार,
हर चौराहे पर हरी बत्ती का इंतज़ार करती हुई ।

कोशिश मैंने भी की,
कुछ उस ज़िन्दगी के रंग-रुप में ढलने की,
थोडे़ दिनों सफल हुआ,
बाद में आदत पड गई खाली हाथ मलने की ।

अब सब कहते है,
फलक ढुंढने का वो अच्छा है बहाना,
हर थके हारे भगोडे की ज़िन्दगी का है ये किस्सा पुराना ।
तुम भी उसी खेत की मूली हो,
ज़िन्दगी से ही भाग रहे हो ।
दिल कहता है ज़िन्दगी से नहीं,
भाग रहा हुँ ज़िन्दगी के संग,
देखना चाहता हुँ उसके कुछ अनछुए रंग ।

तुम्हारी दुनिया तुम्हें भी हो खुब मुबारक,
बस ख्वाबों को ज़रा धीमे भगाना,
क्या पता साँसें कब जाए थक ।
फिर एहसास कुछ ऐसा न हो,
कि ज़िन्दगी के दिन ही पड गए कुछ कम,
बस दो पल की रोटी ही जुटाते रह गए हम ।

Wednesday, September 1, 2010

Yaadein..

कसकर बाँधा था उसे
लोहे के बक्से मे डाला था
उसपर बडा़ सा ताला जड़ दिया
और चाबी भी गुम कर दी ।
सोचा था,
आज नहीं तो कल
दम तोड ही देगी ।
बडा़ बेवकूफ बना मैं
वो मरना कहां जानती है
बात-बात पर बाहर निकल आती है
कभी डायरी के इस पन्ने से
कभी एलबम के उस पन्ने से
या
यूं ही कभी तन्हाई मे साथ देने को ।
परेशानी बस इतनी है
नए रिश्तों से खुब कतराती है ।
इन पुरानी यादों का कोइ इलाज़ है क्या ?