कुछ ख्वाबों को तकीए पर अकेला छोड आया हुँ,
मुस्कुराते हुए स्वार्थ को बेडीयों में जकड आया हुँ
बंगला गाडी के बुलबुलें यूं ही उडा आया हुँ,
ऐशो आराम की कश्ती भी गंगा में बहा आया हुँ,
आसमानी छत के तले एक फलक ढुंढने आया हुँ ।
बेनाम, बेकश, बेखुदी में गुम हो गया है जो कहीं,
सडकों पर हर पल रेंगती हुई ज़िन्दगी में,
झूठ के साये मे हरी-भरी फूलती-फलती ज़िन्दगी में,
हर सफलता पर अपना नाम थोपने को बेकरार,
हर चौराहे पर हरी बत्ती का इंतज़ार करती हुई ।
कोशिश मैंने भी की,
कुछ उस ज़िन्दगी के रंग-रुप में ढलने की,
थोडे़ दिनों सफल हुआ,
बाद में आदत पड गई खाली हाथ मलने की ।
अब सब कहते है,
फलक ढुंढने का वो अच्छा है बहाना,
हर थके हारे भगोडे की ज़िन्दगी का है ये किस्सा पुराना ।
तुम भी उसी खेत की मूली हो,
ज़िन्दगी से ही भाग रहे हो ।
दिल कहता है ज़िन्दगी से नहीं,
भाग रहा हुँ ज़िन्दगी के संग,
देखना चाहता हुँ उसके कुछ अनछुए रंग ।
तुम्हारी दुनिया तुम्हें भी हो खुब मुबारक,
बस ख्वाबों को ज़रा धीमे भगाना,
क्या पता साँसें कब जाए थक ।
फिर एहसास कुछ ऐसा न हो,
कि ज़िन्दगी के दिन ही पड गए कुछ कम,
बस दो पल की रोटी ही जुटाते रह गए हम ।
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