Wednesday, September 1, 2010

Yaadein..

कसकर बाँधा था उसे
लोहे के बक्से मे डाला था
उसपर बडा़ सा ताला जड़ दिया
और चाबी भी गुम कर दी ।
सोचा था,
आज नहीं तो कल
दम तोड ही देगी ।
बडा़ बेवकूफ बना मैं
वो मरना कहां जानती है
बात-बात पर बाहर निकल आती है
कभी डायरी के इस पन्ने से
कभी एलबम के उस पन्ने से
या
यूं ही कभी तन्हाई मे साथ देने को ।
परेशानी बस इतनी है
नए रिश्तों से खुब कतराती है ।
इन पुरानी यादों का कोइ इलाज़ है क्या ?

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